आयुर्वेद शब्दावली निर्देशिका
आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाले मुख्य शब्दों (दोष, धातु, गुण) के अर्थ और परिभाषाएं
कफ
पृथ्वी और जल तत्वों से बना शारीरिक दोष जो संरचना को नियंत्रित करता है।
कफ दोष शरीर के ढांचों, जोड़ों की चिकनाई, और मानसिक स्थिरता को बनाए रखता है। इसके असंतुलित होने पर आलस्य, मोटापा, सर्दी-जुकाम और फेफड़ों में बलगम जमा होने लगता है।
पित्त
अग्नि और जल तत्वों से बना शारीरिक दोष जो चयापचय को नियंत्रित करता है।
पित्त दोष शरीर की गर्मी, पाचन, और हार्मोनल संतुलन को नियंत्रित करता है। इसके बढ़ने से शरीर में अधिक गर्मी, गुस्सा, एसिडिटी और त्वचा पर दाने या मुहांसे हो सकते हैं।
रसायन
आयुर्वेद में प्रयुक्त वे औषधियां जो आयु बढ़ाती हैं और कायाकल्प करती हैं।
रसायन चिकित्सा का उद्देश्य शरीर की धातुओं को पोषण देना, बुढ़ापे को रोकना, बुद्धि व स्मरण शक्ति बढ़ाना तथा रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित करना है। अश्वगंधा, आंवला और गिलोय प्रसिद्ध रसायन हैं।
वात
वायु और आकाश तत्वों से बना शारीरिक दोष जो गति को नियंत्रित करता है।
वात दोष हमारे शरीर में सभी प्रकार की गतियों (जैसे रक्त प्रवाह, सांस लेना, तंत्रिका आवेग) को नियंत्रित करता है। इसके असंतुलित होने पर सूखापन, जोड़ों में दर्द, गैस और चिंता जैसी समस्याएं होती हैं।